Wednesday, February 12, 2020

राशी, साड़ी और मेरी मदहोशी।

बात तब की है जब हम क्लास 10th में थे बोर्ड की परीक्षा सुरु होने वाली थी। उस वक़्त हमारे स्कूल में क्लास 12th कि फे़यरवेल के साथ हमें गुड लक पार्टी मिलती थी। मेरे सारे दोस्त बहुत Exited थें की ब्रांड न्यू clothes , invitation और खाना। एक तरफ मै था जो बहुत खुश था कि किसी खास को पहली बार साड़ी में देखूंगा। क्लास की सबसे शांत लड़कीयों में से थी वो न ज्यादा बात न मस्ती बस किताबों में लगी रहती थी। मेरे दोस्तों के लिए भाभी बन चुकी थी वो और मैने आजतक उससे बात भी नहीं की थी। सब लड़के अपने cloth के colour और डिजाइन सोच रहे थें और मै सोच रहा था कि इस बार उससे बात तो कर लूंगा न। so finally हमलोग perfume वगेरह लगा के शूट बूट पहने स्कूल पहुंचे। वहाँ सभी को hall में बिठाया जा रहा था। कोई पढ़ाई की बात कर रहा था कोई pic click कर रहा था। लेकिन मैं उस भिंड में एक चेहरा ढूँढ रहा था। लेकिन उसकी फ्रेंड से पता चला की वो शायद नहीं आएगीआएगी बोली है पढ़ाई disturb होगी। मेरी तो सारी उम्मीदें ही धरी रह गईगई इतना सज धज कर आना ब्लेज़र पहनना सब मानो बेकार हो गया था। कुछ देर में announcement हुआ और सबको लाईन से venue की ओर ले जाया जाने लगा। मैं उस लाईन में सबसे पिछे खड़ा था और मेरे पिछे वो दरवाजा। मैं इसी इन्तजार में था की शायद वो आ जाये बार बार पिछे देखता। तभी पिछे से आवाज़ आती है - please hold the door for me. मैने पलट के देखा तो वो साड़ी संभालते हुए मेरे तरफ़ आ रही थी। दरवाजे पर कुछ सीढ़ी थी तो मैने हाथ आगे बढ़ाया और कहा संभलके.... पूरे टाइम उस साड़ी में खोई थी बार बार कह रही थी कि मम्मी कैसे पुरे दिन पहने रहती है। वो इस बात से अंजान थी कि कोई इसे इस साड़ी में हीं तो देखने आया था। वो आँखे जिनमें चस्मा रहती थी आज उनमें नूर था। वो स्माइल जो हमेशा किताबों में ढकी रहती थी आज सामने थी। उसके बालों कि एक लट बार बार उसके चेहरे पर आ जाती और वो बड़ी नजाकत से ठीक करती थी.....


Note- आगे की बातें अगले संस्करण में।
                         
                            - विवेक तिवारी

Wednesday, November 20, 2019

तुम्हारी याद आयी है
एक मुस्कान लायी है,
कि मत पुछो गमों की
वो बरसात लायी है,
है मेरे हाथ में कुल्हड़,
लबों पे चाय की चुस्की
ज़हन में यादें है तेरी
वही पुरानी सी,
जो अक्सर भिड़ की तन्हाई में
मुझको घेरे रहते हैं,
मेरे तन्हाई का मतलब तो
बस इतना ही जानो तुम,
कि भरी बाजार भी तेरे बिना
तन्हा ही लगती है।
तुने तो कह दिया था न,
की आएगी नहीं तू अब
फिर आखिर क्यों अकेले में
तुम्हारी याद आयी है।
यकीं मानो नहीं अच्छा है इतनी सियासतें करना,


                                 ...... ... . विवेक तिवारी

Saturday, October 19, 2019

प्यासी रुबैया!

बुंदेलखंड के जंगल में रुबैया और दंभ नाम के दो हिरणों की जोड़ी रहती थी। दोनों में एक दुसरे के लिए बहुत प्यार था इस लिए दोनों खुशी खुशी एक दुसरे के साथ रहा करते थें। दंभ की हर सुबह रुबैया को देख के होती थी और उसकी हर शाम रुबैया की गोद में। एक दिन दंभ और रुबैया आपस में बात करते-करते कब जंगल से रिहायशी इलाके में आ गए उन्हें पता भी नहीं चला। रुबैया को बहुत जोर की भुख लगी थी और तभी उसे सामने एक गाँव दिखा जो यमुना के तट पर बसा हुआ था। वो दोनों चारे के लिए गाँव की तरफ बढ़ें और तभी उन्हें गाँव में चारे का एक खेत दिखा रुबैया उस खेत की तरफ बढ़ी पर दंभ ने उसे रोका क्योंकि उसे बार बार पकड़े जाने का भय सता रहा था। उसने रुबैया से वापस जंगल लौट चलने को कहा पर रुबैया नहीं मानी और भुख से छटपटाती रुबैया चारा चरने लगी पिछे-पिछे दंभ भी गया पर वो बार बार भय से पीछे देखता रहता उसे पकड़े जाने का आभास हो रहा था। फिर काफी देर चरने के बाद रुबैया को प्यास लगी और वो पानी पीने के लिए यमुना की ओर बढ़ी दंभ भी पीछे पीछे चला पर रुबैया ने उसे पानी पिकर तुरंत लौटने की बात कह कर वहीं रोक दिया और अकेले चली गई। काफ़ी वक़्त बितने के बाद जब रुबैया नहीं लौटी तो दंभ को उसके पकड़े जाने का भय सताने लगा। लाचार सा पड़ा दंभ धिरे धिरे रुबैया को खोजते हुए यमुना की ओर बढ़ा पर रुबैया कहीं नहीं दिखी। लाचार सा दंभ रुबैया के लिए चीखते हुए तेजी से आगे बढ़ रहा था। कुछ दुर चलने के बाद एक भयावह सा दृश्य देख कर दंभ गिर पड़ा कुछ बहेलिये रुबैया का हाथ पैर बांध कर ले जा रहे थे, पानी और दंभ दोनों के लिए छटपटाती रुबैया बहेलियों के कैद से छुटने के लिए हाथ पैर मार रही थी। और इधर रुबैया को जाता देख दंभ पूरी तरह से छटपटाती रहा था। पर रुबैया के लिए दंभ ने खुद के जान की परवाह किये बिना बहेलियों का पीछा किया....
(आगे की कहानी अगले संसकरण में)
..... विवेक तिवारी। 

Saturday, August 24, 2019

अरुण अस्त!

भारत के दिग्गज नेता, पूर्व केन्द्रीय मंत्री, ओजस्वी वक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अरुण जेटली जी के निधन पर मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। 🙏

Thursday, August 22, 2019

सपनों में निकलती मेरी अंतिम बाराति।

तारिख 5 जून 2015 समय रात्रि 11 बजे के बाद, रोज कि तरह बिस्तर पर पड़ा मै समान्य कोलाहल के बाद सो जाता हूँ और फिर मै एक स्वपन कि अनुभूति करता हूँ जिसे साझा कर रहा हूँ। स्वपन में मै देखता हूँ कि मेरी मृत्यु हो गई है और और मुझे मेरे अंतिम बाराति ले जाने कि तैयारी हो रही है। काफी उत्सव भरा माहौल है मेरे घर के सारे लोग विलाप रूपी गीत गा रहे हैं। और उनके उस गीत में एक प्रश्न है जो वो मुझसे पुछ रहे हैं कि मैं उन लोगों को छोड़कर कहाँ जा रहा हूँ। मै उनको ये बताना चाहता हूँ कि मै अपने बारात जा रहा हूँ पर लाख कोशिशों के बावजूद भी मै बोल नही पा रहा। अब जाने कि तैयारी में मुझे नहलाया जा रहा है। सब मिल के नहला रहे हैं। फिर मेरे लिए शांति कि संकेत देती सफ़ेद मरकिन की सिरवानी लाई गई और उसमें मुझे लपेट कर जोरों से बाँधा गया। सायद दुल्हे का लिबास उतर न जाए इसकी चिंता रही होगी। फिर दुल्हे यानि मेरे लिए एक सवारी लाई गई जो हरे कच्चे बाँसों से बनी चहचहा रही थी, मैं शीघ्र सवार होना चाहता था। सारी तैयारी पूरी ही थी कि अचानक किसी ने दुल्हे के बिना आभूषण के बारात जाने पर सवाल खड़ा कर दिया और तब मेरे लिए एक अँगूठी लायी गई। लोगों ने ऊंगली के बजाय मुँह में अँगूठी डाल दी शायद जल्दी में हुआ होगा। फिर अपने हरि सवारी पर सवार हो कर राजा वाली अकड़ के साथ रवाना होता हूँ मैं , राजा वाली अकड़ इसलिए क्योंकि मैं चार कंधों के उपर लेटा था। फिर मुझे सारे गाँव में घुमाया जाता है और साथ में भगवान राम के नाम को सत्य ठहराया जाता है हला कि मेरे बारात जाने और उनके नाम के सत्यता के मध्य के संबंध को मै समझ नहीं पा रहा था। अब पूरे गाँव में घुमकर गाँव वालों के साथ काशी को रवाना होती है मेरी अंतिम बाराति। रास्ते में घर वालों के गुफ्तगू से पता चलता है कि मेरे मंडप का स्थान मड़िकड़ीका में है। मैं वहाँ पहुँचता हूँ तो वहाँ पहुँच कर अचंभित हो जाता हूँ क्योंकि वहाँ मेरे स्वागत में एक डोम आया था और लोगों ने बताया कि शादी कि सारी विधी भी यही पूरी करायेगा। घर के कुछ लोग हवन के लिए लकड़ी लाने जाते हैं और कुल 6 मन लकड़ी ले कर वापस आतें है। लकड़ी बोझी जाती है और हवन कि आग सुलग उठती है मानो अग्नि भी मुझे पाने को ललाइत हो पहली बार मेरे लिए किसी को इतना ललाइत देख खुश हूँ मैं। वैसे अब तक मुझे ये पता नहीं था कि मेरी मृत्यु हो चुकी है पर अब धिरे धिरे भनक लगने लगा है। और वापस अपने शिवपुरी न लौट पाने मलाल सा हो रहा है मम्मी भी नहीं है बड़ी दुविधा है। अब सारे कार्य पूरे हो चुकें है पिता के सर से बाल हट चुकें हैं और उनके लिए कठिन वक़्त सुरु होने वाला है। ये विडंबना ही है कि बच्पन में मेरे हर खुशी के लिए संघर्ष करने वाला पिता आज मुझे जला कर खाक कर देगा। मुझे लकड़ी के बिस्तर पर सुला कर मुंह में आग लगाई जाती है और धिरे धिरे अपने असतित्व को खोता मै अग्नि कि रौशनी से अपने पिता को रौशन करता जा रहा हूँ। आगे कि कहानी अगले संसकरण में।
                       
                             ........... विवेक तिवारी!


Monday, August 19, 2019

शोषण से मुक्ति।

विगत सत्र में भारत कि संसद ने तीन तलाक निषेध विधेयक पारित कर एक ऐतिहासिक निर्णय लिया है। ये निर्णय समाज में पनप रहे रूढ़िवादी विचारधारा के विरुद्ध युद्ध का ऐलान होना। और मुझे पूरा यकीन है कि इतिहास प्रधानमंत्री मोदी को ठीक उसी प्रकार याद रखेगा जैसे कि आज हम राजाराम मोहन राय और इश्वर चंद विद्यासागर को एक समाज सुधारक के तौर पर रखते हैं। क्योंकि तीन तलाक भी एक समाजिक कुप्रथा ही थी। इसके जरिये कट्टरपंथी मुस्लिम समाज ने लाखों महिलाओं का शोषण किया जो कि भारत जैसे देश के लिए बेहद ही शर्म की बात है। क्योंकि भारत कि विचारधारा समानता, महिला सशक्तिकरण और मातृ पुजन के इर्दगिर्द घुमती है। और तीन तलाक जैसी कुप्रथा मुख्य तौर समानता के अधिकार का विरोधी है। क्योंकि इसके विच्छेद कि प्रक्रिया पूरी तरह से एक पक्षीय है। इसमें महिलाओं के पक्ष को सुने बिना तलाक ए बिद्दत का तुगलकी फरमान सुना दिया जाता है। इसलिए भारत के लिए ये बेहद जरुरी था कि वो अपने संविधान का पालन करते हुए उसमें अंकित समानता के अधिकार को प्रभावी करे। और इसके विरोध में खड़ी रूढ़िवादी विचारधारा के फन को कुचले।