बुंदेलखंड के जंगल में रुबैया और दंभ नाम के दो हिरणों की जोड़ी रहती थी। दोनों में एक दुसरे के लिए बहुत प्यार था इस लिए दोनों खुशी खुशी एक दुसरे के साथ रहा करते थें। दंभ की हर सुबह रुबैया को देख के होती थी और उसकी हर शाम रुबैया की गोद में। एक दिन दंभ और रुबैया आपस में बात करते-करते कब जंगल से रिहायशी इलाके में आ गए उन्हें पता भी नहीं चला। रुबैया को बहुत जोर की भुख लगी थी और तभी उसे सामने एक गाँव दिखा जो यमुना के तट पर बसा हुआ था। वो दोनों चारे के लिए गाँव की तरफ बढ़ें और तभी उन्हें गाँव में चारे का एक खेत दिखा रुबैया उस खेत की तरफ बढ़ी पर दंभ ने उसे रोका क्योंकि उसे बार बार पकड़े जाने का भय सता रहा था। उसने रुबैया से वापस जंगल लौट चलने को कहा पर रुबैया नहीं मानी और भुख से छटपटाती रुबैया चारा चरने लगी पिछे-पिछे दंभ भी गया पर वो बार बार भय से पीछे देखता रहता उसे पकड़े जाने का आभास हो रहा था। फिर काफी देर चरने के बाद रुबैया को प्यास लगी और वो पानी पीने के लिए यमुना की ओर बढ़ी दंभ भी पीछे पीछे चला पर रुबैया ने उसे पानी पिकर तुरंत लौटने की बात कह कर वहीं रोक दिया और अकेले चली गई। काफ़ी वक़्त बितने के बाद जब रुबैया नहीं लौटी तो दंभ को उसके पकड़े जाने का भय सताने लगा। लाचार सा पड़ा दंभ धिरे धिरे रुबैया को खोजते हुए यमुना की ओर बढ़ा पर रुबैया कहीं नहीं दिखी। लाचार सा दंभ रुबैया के लिए चीखते हुए तेजी से आगे बढ़ रहा था। कुछ दुर चलने के बाद एक भयावह सा दृश्य देख कर दंभ गिर पड़ा कुछ बहेलिये रुबैया का हाथ पैर बांध कर ले जा रहे थे, पानी और दंभ दोनों के लिए छटपटाती रुबैया बहेलियों के कैद से छुटने के लिए हाथ पैर मार रही थी। और इधर रुबैया को जाता देख दंभ पूरी तरह से छटपटाती रहा था। पर रुबैया के लिए दंभ ने खुद के जान की परवाह किये बिना बहेलियों का पीछा किया....
(आगे की कहानी अगले संसकरण में)
..... विवेक तिवारी।
(आगे की कहानी अगले संसकरण में)
..... विवेक तिवारी।
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