तारिख 5 जून 2015 समय रात्रि 11 बजे के बाद, रोज कि तरह बिस्तर पर पड़ा मै समान्य कोलाहल के बाद सो जाता हूँ और फिर मै एक स्वपन कि अनुभूति करता हूँ जिसे साझा कर रहा हूँ। स्वपन में मै देखता हूँ कि मेरी मृत्यु हो गई है और और मुझे मेरे अंतिम बाराति ले जाने कि तैयारी हो रही है। काफी उत्सव भरा माहौल है मेरे घर के सारे लोग विलाप रूपी गीत गा रहे हैं। और उनके उस गीत में एक प्रश्न है जो वो मुझसे पुछ रहे हैं कि मैं उन लोगों को छोड़कर कहाँ जा रहा हूँ। मै उनको ये बताना चाहता हूँ कि मै अपने बारात जा रहा हूँ पर लाख कोशिशों के बावजूद भी मै बोल नही पा रहा। अब जाने कि तैयारी में मुझे नहलाया जा रहा है। सब मिल के नहला रहे हैं। फिर मेरे लिए शांति कि संकेत देती सफ़ेद मरकिन की सिरवानी लाई गई और उसमें मुझे लपेट कर जोरों से बाँधा गया। सायद दुल्हे का लिबास उतर न जाए इसकी चिंता रही होगी। फिर दुल्हे यानि मेरे लिए एक सवारी लाई गई जो हरे कच्चे बाँसों से बनी चहचहा रही थी, मैं शीघ्र सवार होना चाहता था। सारी तैयारी पूरी ही थी कि अचानक किसी ने दुल्हे के बिना आभूषण के बारात जाने पर सवाल खड़ा कर दिया और तब मेरे लिए एक अँगूठी लायी गई। लोगों ने ऊंगली के बजाय मुँह में अँगूठी डाल दी शायद जल्दी में हुआ होगा। फिर अपने हरि सवारी पर सवार हो कर राजा वाली अकड़ के साथ रवाना होता हूँ मैं , राजा वाली अकड़ इसलिए क्योंकि मैं चार कंधों के उपर लेटा था। फिर मुझे सारे गाँव में घुमाया जाता है और साथ में भगवान राम के नाम को सत्य ठहराया जाता है हला कि मेरे बारात जाने और उनके नाम के सत्यता के मध्य के संबंध को मै समझ नहीं पा रहा था। अब पूरे गाँव में घुमकर गाँव वालों के साथ काशी को रवाना होती है मेरी अंतिम बाराति। रास्ते में घर वालों के गुफ्तगू से पता चलता है कि मेरे मंडप का स्थान मड़िकड़ीका में है। मैं वहाँ पहुँचता हूँ तो वहाँ पहुँच कर अचंभित हो जाता हूँ क्योंकि वहाँ मेरे स्वागत में एक डोम आया था और लोगों ने बताया कि शादी कि सारी विधी भी यही पूरी करायेगा। घर के कुछ लोग हवन के लिए लकड़ी लाने जाते हैं और कुल 6 मन लकड़ी ले कर वापस आतें है। लकड़ी बोझी जाती है और हवन कि आग सुलग उठती है मानो अग्नि भी मुझे पाने को ललाइत हो पहली बार मेरे लिए किसी को इतना ललाइत देख खुश हूँ मैं। वैसे अब तक मुझे ये पता नहीं था कि मेरी मृत्यु हो चुकी है पर अब धिरे धिरे भनक लगने लगा है। और वापस अपने शिवपुरी न लौट पाने मलाल सा हो रहा है मम्मी भी नहीं है बड़ी दुविधा है। अब सारे कार्य पूरे हो चुकें है पिता के सर से बाल हट चुकें हैं और उनके लिए कठिन वक़्त सुरु होने वाला है। ये विडंबना ही है कि बच्पन में मेरे हर खुशी के लिए संघर्ष करने वाला पिता आज मुझे जला कर खाक कर देगा। मुझे लकड़ी के बिस्तर पर सुला कर मुंह में आग लगाई जाती है और धिरे धिरे अपने असतित्व को खोता मै अग्नि कि रौशनी से अपने पिता को रौशन करता जा रहा हूँ। आगे कि कहानी अगले संसकरण में।
........... विवेक तिवारी!
........... विवेक तिवारी!
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